निशां छोड़ गए
नमस्कार,जोहार, खम्मागन्नी सा🙏
आज मैं अपने ब्लॉग की रचना में जिक्र की हूं, की जानेवाले तो चले जाते हैं।किंतु अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाते हैं ।और दोस्तों की, रिश्तेदारों की, अपनों की, उनके राजदारों की भी उनसे कई सवाल होते हैं।कई अफशोस होते हैं ।जिसे मैं चित्रित करने का प्रयास की हूं।
"निशां छोड़ गए"
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
अपनी कहकहों में आंसुओं को पी गए
थी इतनी ही चिंता तुम्हे अपनों की
तो बीच मझधार में पतवार क्यों छोड़ गए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
कभी किसी से न की गीले-शिक़वे
बस मुस्कराकर हर बात टाल दिए
हम क्या जानते थे टालने के तो वो बहाने थे
असल मे वो बात तुम दिल पे ले लिए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
अपनी जिंदादिली में व्याकुलता छुपा गए
मासूम चेहरे के पीछे दर्द था कितना गहरा
ये राज राजदारों से भी तुम छुपा गए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
आज समझ आयी तेरी बातों की गहराइयाँ
जब तुम हँस कर कहते थे तो न समझा
और तूने भी तो, मज़ाक था यार कह के
हर बातों की गहराइयों को, टाला करते थे
मज़ाक में कही बातें भी तुम सच कर गए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
एक बार भरोसे पे भरोसा तो किया होता
ज्यादा नही तो कम भी,हम गम न बांटते
जो होता देख लेते,
पर अभी तो मिल बातें संभाल लेते ।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
अपनी कहकहों में आंसुओं को पी गए।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
26/6/2020
आज मैं अपने ब्लॉग की रचना में जिक्र की हूं, की जानेवाले तो चले जाते हैं।किंतु अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाते हैं ।और दोस्तों की, रिश्तेदारों की, अपनों की, उनके राजदारों की भी उनसे कई सवाल होते हैं।कई अफशोस होते हैं ।जिसे मैं चित्रित करने का प्रयास की हूं।
"निशां छोड़ गए"
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
अपनी कहकहों में आंसुओं को पी गए
थी इतनी ही चिंता तुम्हे अपनों की
तो बीच मझधार में पतवार क्यों छोड़ गए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
कभी किसी से न की गीले-शिक़वे
बस मुस्कराकर हर बात टाल दिए
हम क्या जानते थे टालने के तो वो बहाने थे
असल मे वो बात तुम दिल पे ले लिए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
अपनी जिंदादिली में व्याकुलता छुपा गए
मासूम चेहरे के पीछे दर्द था कितना गहरा
ये राज राजदारों से भी तुम छुपा गए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
आज समझ आयी तेरी बातों की गहराइयाँ
जब तुम हँस कर कहते थे तो न समझा
और तूने भी तो, मज़ाक था यार कह के
हर बातों की गहराइयों को, टाला करते थे
मज़ाक में कही बातें भी तुम सच कर गए।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
एक बार भरोसे पे भरोसा तो किया होता
ज्यादा नही तो कम भी,हम गम न बांटते
जो होता देख लेते,
पर अभी तो मिल बातें संभाल लेते ।
तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए
अपनी कहकहों में आंसुओं को पी गए।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
26/6/2020

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