पर्यावरण की पुकार

   "पर्यावरण की पुकार*
आज मै अहले सुबह बैठी थी खिड़की पे प्रकृति का वो मनमोहक रूप देख हो रही थी विमुग्ध
वो बारिश की बूंदे जब हरे हरे पत्तों को छू रही थी
उसकी वो सुमधुर आवाज धीरे से कानों में मिश्री सी घोल रही थी
तभी जैसे आवाज आई ,कितने दिनों तक यूंही निहार पाओगे मुझे
इन कंक्रीटों के मोह जाल में,सिमटते हुए मानवता से
आज तो सिर्फ तरसते हो स्वच्छ पानी पीने  को
कल तरसोगे स्वच्छ हवा में सांस लेने को ,
तब क्या सुन पाओगे मेरी पुकार ।

चारों ओर से कर रहे हो मुझसे विश्वासघात,
मेरी छाया में बैठ, तुम करते उधेड़ बुन कितने मिलेंगे इस पेड़ के,
पहले तो बनाते थे मुझसे काग़ज़,
अब प्लास्टिक बना करते हो मुझे लहूलुहान,
फिर भी हूं मै वसुंधरा माता तेरी।

जरा सोचो।
करो सुविचार,अपनी मानवता पे
संकल्प करो आज फिर एक बार
एक पेड़ को लगाएंगे हम अपने जीवन के इस विषम स्थिति में
करेंगे सेवा उसकी येसे ,जैसे हो छोटी सी संतान हमारी ।
फिजूल ना काटेंगे और ना करेंगे प्लास्टिक इस्तेमाल।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
5/6/2020

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