थोड़े से सुख के लिए

   *थोड़े से सुख के लिए*
थोड़े से सुख के लिए
क्या पाया, क्या गंवाया
आज देख लो सड़कों को नापते
इन लड़खड़ाते नंगे पैरों को
जीवन की आस में
मौत की ओर बढ़ते इस रेले को।

थोड़े से सुख के लिए
क्या पाया क्या गंवाया,
क्षणिक सुख की मायाजाल में
छोड़ आए थे ये रिश्तों की बगिया
बड़े - बुजुर्गों की डांट भरी सीख
और छोटों की वो अधिकार का लड़कपन
बड़ी अच्छी लगती थी ये आधुनिकता
सुख की तलाश में खो आए थे शान्ती।

थोड़े से सुख के लिए
क्या खोया, क्या पाया
आज ये अपनी झूठी अभिलाषाओं की,
चुका कीमत सोच रहे हैं
इस झूठी शान से भली थी वो अमरैया
जहां एक आह पे दौड़ पड़ते थे सभी भैया।

थोड़े से सुख के लिए
क्या खोया, क्या पाया
गांव छूटा, छुट्टी वो सोंधी सी खुशबू
छुट्टी वो दोस्तों की टोली
और ना जाने क्या - क्या छूटा
और क्या क्या टूटा इस अंधी दौड़ में।

इस महामारी काल में
जब आंखे खुली तो लूट चुके थे ये
इस क्रूरता के आधुनिक बाज़ार में
झूठे सपनों ने भी आंखे फेर ली थी
तब याद आया इन्हे अपना वो गांव
जहां नमक रोटी भली थी
बड़बोले की इस झूठी कमाई से।

थोड़े से सुख के लिए
क्या खोया, क्या पाया
हाथ पकड़ने वाले वो हमदर्द भी
परछाइयों से भी कर रहे परहेज
आज नंगे पैर, मिलों का सफ़र
कंधे पे भी जिम्मेवारियों का बोझ
ये तन झुलसाती धूप भी बनी है हमसफ़र
क्यूंकि इन्हे अपने गांव जाना है।

थोड़े से सुख के लिए
क्या खोया, क्या पाया
छोड़ आए थे, तोड़ आए थे नाते सारे
आज वो जमीं इन्हे बुला रही है
ये महामारी भी ना बन सकी
इनकी पांवों की बेड़ियां
तोड़ सारे मायाजाल
लहूलुहान पैरों से निकल पड़े
ये अपने जड़ को सींचने को।
और सोच रहे
थोड़े से सुख के लिए
क्या खोया, क्या पाया।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
24/5/2020



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