भीगी-भीगी पलकें
नमस्कार🙏 जोहर🙏 खम्मागन्नी सा🙏
कोई भी प्रेमी अपने सच्चे प्यार को जिंदगी भर नही भूल पाता।और वेचैनियां उसका साथ नहीं छोड़ती।और जब भी वो उस गली से गुजरता है।बीती यादें आंखों के सामने सजीव हो उठती हैं।और अंत में दिल को लाख तसल्ली देने के बाद भी निराश ही हाथ लगती है।🙏
*भीगी-भीगी पलकें*
भीगी-भीगी पलकें और गहराता सन्नाटा,झिगुरों के कलरव
ये दास्तान या तो मै जानू या ये गीली तकिये का लिहाफ
मौसम भी बरस जाता है झर-झर,कभी-कभी दुखी हो मेरे दास्तां से ।
अधखुली आंखों से यादों में रोज सैर कर आता हूं
तेरी आवाज की खनक से वीरान उन गलियों से
पर अब वो बात कहां उन गलियों-चौबारों में
जो तेरे आने की आहट से वेचैन कर देती थी धड़कने मेरी ।
आज भी सजती है वो दुकाने जो हमारा ठिकाना था
मिर्च,पालक पकौड़ी, चाय की खुशबुओं से
गुलज़ार होती हैं
पर वो इतज्जार की वेचैनियां अब कहां इन गलियारों में ।
कभी-कभी मैं ठिठक कर निहार लेता हूँ तेरी देहरी को
बदल तो बहुत कुछ गया है पर बदला नही वो तेरी अधखुली खिड़की
कभी-कभी भरम हो जाता है,कहीं छुप के तू भी तो नही निहार रही।
पर आशाओं की झोली निराशाओं से भर जाती है
जब हवा के झोंके से वो अधखुली खिड़की जंग लगी आवाज करती है
और पहरेदार सुने बंगले की खालीपन आंखों में लिए मुझे घूरता है ।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
14/7/2020
कोई भी प्रेमी अपने सच्चे प्यार को जिंदगी भर नही भूल पाता।और वेचैनियां उसका साथ नहीं छोड़ती।और जब भी वो उस गली से गुजरता है।बीती यादें आंखों के सामने सजीव हो उठती हैं।और अंत में दिल को लाख तसल्ली देने के बाद भी निराश ही हाथ लगती है।🙏
*भीगी-भीगी पलकें*
भीगी-भीगी पलकें और गहराता सन्नाटा,झिगुरों के कलरव
ये दास्तान या तो मै जानू या ये गीली तकिये का लिहाफ
मौसम भी बरस जाता है झर-झर,कभी-कभी दुखी हो मेरे दास्तां से ।
अधखुली आंखों से यादों में रोज सैर कर आता हूं
तेरी आवाज की खनक से वीरान उन गलियों से
पर अब वो बात कहां उन गलियों-चौबारों में
जो तेरे आने की आहट से वेचैन कर देती थी धड़कने मेरी ।
आज भी सजती है वो दुकाने जो हमारा ठिकाना था
मिर्च,पालक पकौड़ी, चाय की खुशबुओं से
गुलज़ार होती हैं
पर वो इतज्जार की वेचैनियां अब कहां इन गलियारों में ।
कभी-कभी मैं ठिठक कर निहार लेता हूँ तेरी देहरी को
बदल तो बहुत कुछ गया है पर बदला नही वो तेरी अधखुली खिड़की
कभी-कभी भरम हो जाता है,कहीं छुप के तू भी तो नही निहार रही।
पर आशाओं की झोली निराशाओं से भर जाती है
जब हवा के झोंके से वो अधखुली खिड़की जंग लगी आवाज करती है
और पहरेदार सुने बंगले की खालीपन आंखों में लिए मुझे घूरता है ।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
14/7/2020

Bhut khub,, आपकी लेखनी में जादू है
ReplyDelete👌👌👌👌👌
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