मेरा बचपना और बदल
"मेरा बचपना और बादल"
मैं चुलबुली सी हवाओं से कर रही थी अठखेलियाँ
वो बादलों का झुंड भी चारों ओर से घेर
जैसे बना रहा था छतरी की कोई और देखे ना
और अपनी बादलों की दो आंखों से निहार रहा था मेरा बचपना।
बिजलियाँ भी कौंध कौंध कर मानो डरा रही थी मुझे
बादल उनपे गरज मेरे बचपने को दे रहे थे आसरा
अचानक ही बूंदे बरसे बिना ही बादल हुआ यूं नाराज़
जा बैठा दूसरे देश ,और चिढ़ा रहा मुझे
फिर ना जाने क्या सूझी उसे ,लौट आया
और रिमझिम रिमझिम बरसने लगा।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
27/7/2020
मैं चुलबुली सी हवाओं से कर रही थी अठखेलियाँ
वो बादलों का झुंड भी चारों ओर से घेर
जैसे बना रहा था छतरी की कोई और देखे ना
और अपनी बादलों की दो आंखों से निहार रहा था मेरा बचपना।
बिजलियाँ भी कौंध कौंध कर मानो डरा रही थी मुझे
बादल उनपे गरज मेरे बचपने को दे रहे थे आसरा
अचानक ही बूंदे बरसे बिना ही बादल हुआ यूं नाराज़
जा बैठा दूसरे देश ,और चिढ़ा रहा मुझे
फिर ना जाने क्या सूझी उसे ,लौट आया
और रिमझिम रिमझिम बरसने लगा।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
27/7/2020

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