खामोशी

 आज मैं खामोशी पे एक ग़ज़ल लिखने का प्रयास की हूं।खामोशी की भी एक अलग दुनिया होती है।वो बिना बोले बहुत कुछ नज़रों से बोल जाती है। और खाश कर तब जब मामला इश्क का हो तो।आशा करती हूं कि आपको पसंद आएगी

      *खामोशी*

खामोशियों में भी एक फ़साना होता है
यहां जबां कम नज़रें ज्यादा बोलती हैं।

इन सन्नाटों में भी, दिल के कई राज दफन है
पर चेहरे पे मासूमियत लिए, नज़रे चुलबुली सी हैं।

इन तन्हाइयों की भी,अपनी मशरूफियत है
किसी के आने के इंतज्जार से, नज़रों में हलचल सी हैं।

सुना है खामोशियों तले, इज़हारे मोहब्बत की दास्तां होती है
पर नज़रे हैं शरारती, भरे महफिलों में भी बयां कर देती हैं ।

वो खामोश हैं, जमाने की रुसवाइयों से भी डरते हैं
और इश्क़ परवाने की देखिए गुस्ताखियां,
कि जख्मों की गहराइयों से भी,बेपरवाह हो गए हैं।

जानना था उन्हें हमारे दिले-हाल,तो कैफ़ियत पूछते हैं
और तिरछी नज़रों से,पलके झपका दीवाना बना देते हैं।

उनकी ये अदा दिल को चुपके से छू लेती है
और ये दिल-ए-खामोशी है कि,तन्हाइयों को चुन लेती है ।

सोचा खत्म हुई,अब ख़ामोशियों के अफ़साने के किस्से
पर उनकी जबां तो खामोश थे ही
अब नज़रों ने भी दीदारे जगह बदल ली हैं।

श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
6/7/2020


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