लैंगिक समानता
"लैंगिक समानता"
लैंगिक समानता का सीधा अर्थ है,समाज में महिला पुरुष दोनों का समान अधिकार हो,हर क्षेत्र में चाहे वो दायित्व हो, रोजगार हो, मनोरंजन, हो खेल जगत हो, शिक्षा का क्षेत्र हो या डिफेंस का क्षेत्र हो ।
इसके लिए कई हस्तियों ने सवाल भी उठाए हैं, और समर्थन भी किये हैं ।
अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने इस भेदभाव पर नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि -"आजकल की महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर काफी मुखर हैं और मैं सिर्फ फिल्म उद्योग में ही बदलाव नहीं चाहती, बल्कि खेल या व्यापार या किसी भी अन्य पेशे में महिलाओं के लिए समान वेतन चाहती हूं|"मनोरंजन जगत के अलावा भी ऐसे बहुत से क्षेत्र है जहाँ महिलाएं असमान वेतन की समस्या से जूझ रही हैं।
"एक्ट्रेस तापसी मन्नू ने ट्वीट कर आर्मी में महिला कमांडर की भर्ती ना होने को लेकर लैंगिक समानता पर सवाल उठाया।"
वहीं सेना प्रमुख ने सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के कोर्ट के फैसले पर सेन कहा कि- "यह हमें आगे बढ़ने की दिशा में काफी स्पष्टता प्रदान करेगा"
NCERT ने भी कहा कि -लैंगिक रूढ़ियों को प्राथमिक-स्कूल के स्तर पर ही खत्म किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे जब बड़े हों तो वे लिंग के आधार पर पक्षपात नहीं करें"
UNO महासचिव ने भी covid19 से निपटने में महिलायों को प्रमुखता देने की बात कही है
इस तरह हम कह सकते हैं कि समाज में लैंगिक समानता के नही होने के कारण ही, असंतुलन और अपराध को जन्म होता है।
हालांकि सरकार द्वारा लैंगिक समानता के स्तर को ऊंचा उठाने हेतु कई योजनाएं 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ "जैसी लागू की जा रही हैं,फिर भी भारत इस मामले में पिछड़ा हुआ है। अब आवश्यकता है समाज के बुनियादी ढांचे को बदलकर दकियानूसी सोच को ख़त्म करने की। लैंगिक समानता के लिए समाज से न केवल स्त्रियों को बल्कि शिक्षित वर्ग को भी जनजागरण का कार्य करना होगा ताकि अपराधों में रोकथाम के साथ ही महिलाओं के आधिकारिक व कार्यस्थल में हो रहे शोषण का खात्मा किया जा सके।
लैंगिक समानता की सबसे बड़ी बाधा है-पितृसत्तात्मक समाज और सामाजिक परम्परा एवम कुरीतियां जो कई पीढ़ियों से चला आ रहा है।साथ ही महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पे शारीरिक रूप से भी अधिक असुरक्षित हैं। सिर्फ राजधानी दिल्ली का ही आंकड़ा देखा जाए तो वहां की 92 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर यौन या शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर 53.9 प्रतिशत है।साथ ही भारत की 60 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर कोई मूल्यवान परिसंपत्ति नहीं है। हैरत नहीं है कि देश की जीडीपी में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 17 प्रतिशत है जबकि उनका विश्व औसत 37 प्रतिशत है।लेकिन ऐसा अनुमान है कि भारत में लैंगिक समानता के आधार पे महिलाओं के साथ भेदभाव न किया जाए तो 2025 तक देश की जीडीपी में 700 बिलियन US$ का इजाफा हो सकता है।
इसके लिए हमे कुछ ठोस कदम उठाने होंगे- जैसे
1 शैक्षणिक स्तर को विकसित करना। क्योंकि एक विकसित राष्ट्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटक होता है, वहां की जनता का साक्षर होना।
2 रोजगार के समान अवसर को विकसित करना-
इसके लिए रोजगार के अवसर को लिंग के आधार पर नही कार्यकुशलता के पैमाने पे परख कर अवसर प्रदान करना चाहिए।ताकि ओ राष्ट्र निर्माण में पुरुषों कली भांति ही अपनी भूमिका निभा सकें।
3 निजी क्षेत्र और कारोबारी समुदाय इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।और महिलाओं में मार्केटिंग संबंधी कौशल और बेहतर तरीके से फैसले लेने की क्षमता को विकसित करने के लिए व्यावसायिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करना होगा ।जैसे जीवन कौशल और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम। कंपनियां लघु वित्त के जरिए महिला उद्यमियों की मदद कर सकती हैं और उनके उत्पादों एवं सेवाओं को आपूर्ति श्रृंखलाओं में जोड़ सकती हैं।साथ ही इंटरनेट और आईसीटी तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाने से कनेक्टेड महिलाओं का उभरता बाजार तैयार हो सकता है जोकि कारोबार के अवसरों से जुड़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के रूप में निजी क्षेत्र महिलाओं को घर और सार्वजनिक स्थानों पर हिंसा से सुरक्षा प्रदान कर सकता है। वह समावेशी परिवहन के जरिए महिलाओं का आवागमन सुनिश्चत कर सकता है।
डब्ल्यूइएफ की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक भारत लैंगिक समानता के क्षेत्र में विश्व में 108वें स्थान पर है। रिपोर्ट के आधार पर यह बात सामने आती है कि पिछले वर्ष के मुताबिक भारत लैंगिक भेदभाव को 67% तक कम करने में सफल रहा है। इस तरह यदि स्त्री-पुरूष को साथ लेकर चला जाए तो न केवल लैंगिक समानता के मामले में राष्ट्र प्रथम स्थान पर होगा साथ ही राष्ट्र प्रगति भी करेगा और हम विकासशील से विकसित की श्रेणी में आने में जो चंद कदमों की दूरी है ,वो भी फासला मिट जाएगा।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
9/8/2020

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