जिउतिया पर्व
जिउतिया पर्व
जिउतिया पर्व आश्विन माह में कृष्ण-पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन दिनों तक मनाया जाता है। यह पर्व उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। इसके अलावा नेपाल के मिथिला और थरुहट में भी मनाया जाता है।इस पर्व में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत करती है।
👉वैसे ये अब लगभग भारत के सभी क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से प्रचलित है।और सन्तान की दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की कामना हेतु मनाई जाती है।
इस पर्व में पहले दिन अलग अलग राज्यों में अलग अलग विधि से लोग शुरुआत करते हैं।कहीं पहले दिन के शाम से नहा कर शुद्ध भोजन कर शुरुआत करती हैं,तो कहीं माताएं एक समय भोजन करती हैं।वहीं हमारे झारखण्ड के पलामू में इसकी शुरुआत पहले दिन के सूर्योदय से ही शुरुआत हो जाती है।माताएं सुबह उठ कर सबसे पहले दतवन-पानी चिल्हनी-सियारनी माता को देकर खुद दतवन करती हैं।उसके बाद नाश्ता के समय खीरा, मिठाई,फल, हलवा शुद्ध घी में बना कर पहले चिल्हनी-सियारनी माता को अर्पण कर के फर खुद ग्रहण करती हैं।उसके बाद चावल-बराई का दाल, पांच तरह की सब्जी,कन्दा का चोखा भोग लगा कर ।फिर खुद और पूरे परिवार को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने को देती हैं।फिर शाम में पूरी-पुआ, सब्जी और सेवई जरूर बनता है।इसे भी चिल्हनी-सियारनी माता को अर्पण करने के पश्चात पूरे परिवार के साथ मिलकर ग्रहण करती हैं।दूसरे दिन निर्जला व्रत कर के चिल्हनी-सियारनी माता और जीमूतवाहन भगवान की पूजा कर सन्तान की लंबी आयु की कामना करती हैं।तीसरे दिन फिर से दतवन-पानी से शुरुआत होती है।और पारण के लिए 5 तरह की चीजें 5-5 के रेशियो में खड़ा ही कच्चे दूध से निगलती हैं। उसके बाद दोपहर में फिर से चावल-बराई का दाल,5 तरह की सब्जियां, रायता,कन्दा का भरता इत्यादि बना कर भोग लगाने के पश्चात पूरे परिवार के साथ ग्रहण करती हैं।इसमें अलग-अलग राज्यों में थोड़ा-थोड़ा डिफरेंट रहता है।जैसे कि छोटा नागपुर में मडुआ का आटा, और नोनी साग जरूर रहेगा।तो कहीं कहीं तो पारण में मछली जरूर बनेगा।
ऐसी भी धार्मिक मान्यता है कि जितकी सन्तान ना हो वो पारण के दिन नदी में स्नान कर खुद छोटी वाली मछली जिंदा निगल जाएंगी तो सन्तान की प्राप्ति होगी।
पारण के दिन माताएं अपनी संतान को ठीक लगा कर उनकी लम्बी आयु और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
इसकी 2 कथाएं प्रचलित है।एक जीमूतवाहन की, दूसरी उतरा की संतान जीवित्पुत्रिका की।जो इस प्रकार है।
इस कथा के अनुसार जीमूतवाहन गंधर्व के बुद्धिमान और राजा थे। जीमूतवाहन शासक से संतुष्ट नहीं थे और परिणामस्वरूप उन्होंने अपने भाइयों को अपने राज्य की सभी जिम्मेदारियां दीं और अपने पिता की सेवा के लिए जंगल चले गए। एक दिन जंगल में भटकते हुए उन्हें एक बुढ़िया विलाप करती हुई मिलती है। उन्होंने बुढ़िया से रोने का कारण पूछा। इसपर उसने उसे बताया कि वह सांप (नागवंशी) के परिवार से है और उसका एक ही बेटा है। एक शपथ के रूप में हर दिन एक सांप पक्षीराज गरुड़ को चढ़ाया जाता है और उस दिन उसके बेटे का नंबर था। उसकी समस्या सुनने के बाद जिमूतवाहन ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उनके बेटे को जीवित वापस लेकर आएंगे। तब वह खुद गरुड़ का चारा बनने का विचार कर चट्टान पर लेट जाते हैं। तब गरुड़ आता है और अपनी अंगुलियों से लाल कपड़े से ढंके हुए जिमूतवाहन को पकड़कर चट्टान पर चढ़ जाता है। उसे हैरानी होती है कि जिसे उसने पकड़ा है वह कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहा है। तब वह जिमूतवाहन से उनके बारे में पूछता है। तब गरुड़ जिमूतवाहन की वीरता और परोपकार से प्रसन्न होकर सांपों से कोई और बलिदान नहीं लेने का वादा करता है। मान्यता है कि तभी से ही संतान की लंबी उम्र और कल्याण के लिए जितिया व्रत मनाया जाता है।
दूसरी कथा महाभारत युद्ध में पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत क्रोधित था। वह पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर गया और उसने पांच लोगों की हत्या कर दी। उसे लगा कि उसने पांडवों को मार दिया, लेकिन पांडव जिंदा थे। जब पांडव उसके सामने आए तो उसे पता लगा कि वह द्रौपदी के पांच पुत्रों को मार आया है। यह सब देखकर अर्जुन ने क्रोध में अश्वथामा को बंदी बनाकर दिव्य मणि को छीन लिया।अश्वत्थामा ने इस बात का बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने की योजना बनाई। उसने गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया, जिससे उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया। लेकिन उस बच्चे का जन्म लेना बहुत जरूरी था। इसलिए भगवान कृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में ही फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर जीवत होने की वजह से इस तरह उत्तरा के पुत्र का नाम जीवितपुत्रिका पड़ गया और तब से ही संतान की लंबी आयु के लिए जितिया व्रत किया जाने लगा।
एक कथा चिल्हनी और सियारनी माता की भी इस प्रकार है----
जितिया व्रत की कथा नर्मदा नदी के पास कंचनबटी नाम का नगर था। वहां का राजा मलयकेतु था ।नर्मदा नदी के पश्चिम दिशा में मरुभूमि थी, जिसे बालुहटा कहा जाता था। वहां विशाल पाकड़ का पेड़ था। उस पर चील रहती थी। पेड़ के नीचे खोधर था, जिसमें सियारिन रहती थी। चील और सियारिन, दोनों में दोस्ती थी।एक बार दोनों ने मिलकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया।फिर दोनों ने भगवान जीऊतवाहन की पूजा के लिए निर्जला व्रत रखा। व्रत वाले दिन उस नगर के बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गयी। अब उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया।
काली रात हुई और घनघोर घटा बरसने लगी। कभी बिजली कड़कती तो कभी बादल गरजते। तूफ़ान आ गया था। सियारिन को अब भूख लगने लगी थी।मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।
फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सियारन, छोटी बहन के रूप में जन्मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे।
कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए। वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी। उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए। उन्हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया।
यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिटटी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए।जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी।
जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई।अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था।भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई। जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया।
इस बार जितिया व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि का प्रारंभ 09 सितंबर बुधवार को दोपहर 01:35 बजे पर होगा। जो 10 सितंबर, गुरुवार दोपहर 03:04 बजे तक रहेगी। व्रती उदया तिथि की मान्यता के अनुसार यह व्रत 10 सिंतबर को रखेंगे।
इस तरह हम देखते हैं कि हमारे सभी पर्व-त्योहार प्रकृति से जुड़ी है किसी ना किसी रूप में।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंका राज
9/9/2020

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