बारिश

 नमस्कार🙏जोहार🙏खम्मागन्नी सा🙏आज मैं अपनी भतीजी की उस निश्छल चिंता को चित्रित करने का प्रयास की हूं।आज मैं मोबाइल की गैलेरी में फ़ोटो देख रही थी तो अनायास ही यह अहसास जीवंत हो उठी जिसे मैंने शब्दबद्ध करने की कोशिस की हूं।



           बारिश


मैं टहल रही थी आंगन में प्रफुलित सी

सँजो रही थी बारिश की बूंदों को अंतर्मन तक

तभी छोटी-छोटी डग भरती दौड़ती आई

पायल की रुनझुन से मंत्रमुग्ध करती आई।


तुतलाती जबां में मेरा ही नाम पुकार रही थी

बुआ-बुआ,मैं आ गयी नही तो आप भीग जाती

हाथों में उसके उससे बड़ी छतरी थी

चेहरे पे भोली मुस्कान और थी निश्छल चिंता।


उसे देख बचपना मन मे अंकुरण लेने लगी

उस पल उसकी बातों से बचपन में हम खो गए

वो और हम दोनों जैसे एक हो गए

वो थोड़ी बड़ी बन गयी,मैं थोड़ी बच्ची बन गयी।


फिर बारिश की बूंदों से हम दोनों खूब खेले

न डर था सर्दी जुकाम का,न डर बुखार का

बस जी लेना चाहते थे इस पल-पल को।


श्रीमती मुक्ता सिंह

रंकाराज

4/10/20






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