रिश्तों के मायने बदल गए


 रिश्तों के मायने बदल गए


देखो रिश्तों के मायने बदल गए

मां का लाड़,प्यार से भरा डांट

अब गरिमा की चुंदरी ओढ़े है

लाडो से कब नाम पे आ गए


देखो रिश्तों के मायने बदल गए

वो प्यार अब कुछ पराया सा लगता है

अल्हड़पन भी गरिमा के बंधन में है बंधा

बहुत खुश होती हैं बेटियां मायके जाकर

पर क्या अब वो अपनापन बसता है वहां


देखो रिश्तों के मायने बदल गए

बड़े प्यार से निहारती है अपने कमरे को

जो अब किसी और के कहकहों से हैं गूंजते 

बड़े अरमानो से सजाया था कभी इसको

नम आंखों से ढूंढती हैं अपनी पुरानी यादें

दीवारों,पर्दे सभी में ढूंढती है बेटी अपना रंग

अब तो अपना कमरा भी मुंह चिढ़ाता है उनको


थोड़ा आंगन में टहलती है

अपने लगाए फूलों की खुशबुयों को ढूंढती है

पर वो गुलाब का गुच्छा कब का मुरझा गया

अब डालिया भी नही है कहीं,बस यादें हैं


थोड़ा घूम आती हैं बगीचे में

वो अमरूद,बेर, आम,लीची के पेड़ भी नही रहे

मुंह चिढ़ाता है अब वो अल्हड़ बचपन 

देखो रिश्तों के कितने मायने बदल गए।


श्रीमती मुक्ता सिंह

रंकाराज

4/5/21

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