कैसे जियूँ तेरे बिन
*कैसे जियूँ तेरे बिन*
सब्र ही नही होता अब,लाख समझाऊं दुनियादारी
चूक ही नही मिलती,लाख ढूंढता दिल बारीकी से
सपने सज़ा रही थी तेरी शहनाइयों की
गीतों के बोल संभाल रही थी चुपके से
डोली-काहार और न जाने कितने ख़्वाब
खुली आँखों से देख रही थी रोज नए
कपड़े-गहने सभी संभाल रही थी
तुझे सपनों में सजा-सजा कर
रिश्तेदारों की लिस्ट भी बना रखी थी
भूले-बिसरे रिश्तों को भी संभाल रही थी
हर रश्मों को नए अंदाज़ में निभाने को
चुन रही थी एक्सपर्टों की टोली
ताकि कमी ना रहे मेरी लाडो के शादी में
उंगली ना कोई उठाये कभी रिवाज़ों को लेकर
बस इंतज़ार था तेरे सपनों की उड़ान भरने को
फिर हर ख्वाब रखती तेरे कदमों में
नियति भी दूर खड़ा बन रहा था जाल
मैं अनजान सो रही थी ख़्वाबों की ठंढी छांव में
जाने कहाँ से एकपल को आया क्रूर काल
ले गया मेरी धड़कन को बवंडर में छुपा कर
अब कैसे जियूँ तेरे बिन मेरी लाडली
कोशिशों की पहाड़ चढ़ती हूं हरपल
जिम्मेवारियों की बन्धन में खुद को कैद कर
तभी तेरी यादों का झोंका आता है
और उमड़ पड़ते हैं दर्द के सागर
नयनों से हर बन्धन को तोड़ कर
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
19/11/21

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