वीर राजकुमारी चम्पा
वीर राजकुमारी चम्पा
कहा जाता है कि हमारी भारत-भूमि के कण-कण में हैं बलिदानी।आज हम आप सभी को ऐसी ही देशप्रेम से ओत-प्रोत वीर बालिका से मिलवाने वाली हूं।जिसेके धमनियों में विरासत में वीर पिता महाराणा प्रताप से देशप्रेम,दयालुता और वीरता मिला था।वो थी हमारे महाराणा प्रताप की सुपुत्री " मासूम वीर राजकुमारी चम्पा"।
वीर राजकुमारी चम्पा : बताया जाता है कि जब महाराणा प्रताप मुगलों के समक्ष झुकने के बजाए जब वन-वन भटक रहे थे तो उनके साथ उनके बच्चों को भी भूखे-प्यासे दिन-रात पैदल चलना पड़ता था। 3-3, 4-4 दिन तक वो जंगली बेर व घास की रोटियां खाकर रहते थे।उस समय महाराणा की पुत्री चम्पा 11 वर्ष की और उनके पुत्र 4 वर्ष के थे।एकदिन राजकुमारी चम्पा अपने 4 वर्षीय भाई के साथ नदी किनारे खेल रही थी,तब राजकुमार को भूख लग गयी।और वह रोटी मांगते हुए रोने लगे।उस छोटे से सुकोमल राजकुमार को यह कहाँ ज्ञात की आज उनके माता-पिता के पास अपने युवराज के लिए रोटी का टुकड़ा भी नहीं है।ऐसे में राजकुमारी चम्पा ने अपने भाई को कहानी सुनाकर व फूलों की माला पहनाकर भूखा ही बहला कर सुला दिया।
और जब राजकुमारी चम्पा अपने छोटे भाई को गोद में लेकर माता के पास सुलाने आई तो, महाराणा को चिंता में डूबे हुए देखकर बोली, 'पिताजी! आप चिंतित क्यों हैं?'
महाराणा बोले 'बेटी! हमारे यहां एक अतिथि पधारे हैं।पर आज ऐसे दुर्दिन आ गए है कि चित्तौड़ के राणा के यहां से अतिथि भूखा चला जाएगा।'
तब राजकुमारी चम्पा बोली, 'पिताजी महाराज! आप चिंता न करें! हमारे यहां से अतिथि भूखा नहीं जाएगा। आपने मुझे कल जो दो रोटियां दी थीं, वे मैंने भाई के लिए बचाकर रखीं थीं,किन्तु अब वह सो गए हैं।और मुझे भी भूख नहीं है।तो अब आप उन रोटियों को अतिथि को दे दीजिए।' इतना कहकर राजकुमारी चम्पा ने पत्थर के नीचे दबाकर रखी घास की रोटियां पत्थर हटाकर ले आई।और थोड़ी-सी चटनी के साथ वे रोटियां अतिथि को दे दी। अतिथि रोटी खाकर चले गये।
महाराणा प्रताप अपनी सुपुत्री के इस त्याग को देखकर द्रवित हो उठे।अब उनसे अपने बच्चों का कष्ट देखा नहीं जा रहा था।और उसी मानसिक उदग्विणता में उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए पत्र लिखा। 11 वर्षीय सुकुमार बालिका चम्पा 2-4 दिन में तो घास की रोटी पाती थी और उसे भी बचाकर रख लिया करती थी। अपने भाग की रोटी वह अपने भाई को थोड़ी-थोड़ी करके खिला देती थी। भूख के मारे वह स्वयं दुर्बल व कृशकाय हो गई थी। एक दिन वह भूख से मूर्छित हो गई।
महाराणा ने उसे गोद में उठाते हुए रोकर कहा- 'मेरी सुपुत्री! अब मैं तुझे और कष्ट नहीं दूंगा। मैंने अकबर को पत्र लिख दिया है।' यह सुनकर चम्पा मूर्छा में भी चौक पड़ी, बोली, 'पिताजी महाराज! आप यह क्या कह रहे हैं? हमें मरने से बचाने के लिए आप अकबर के दास बनेंगे? पिताजी महाराज! हम सब क्या कभी मरेंगे नहीं? पिताजी महाराज! देश को नीचा मत दिखाइए! आपको मेरी शपथ है, आप अकबर की अधीनता कभी स्वीकार न करें।' इन्हीं वचनों के साथ ही मासूम राजकुमारी चम्पा ने महाराणा की गोद में ही दम तोड़ दिया।

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