काश कोई लौटा दो
*काश कोई लौटा दो*
इन दवाओं की शुक्रगुजार हूं मै,क्योंकि
इन्हें खाते ही हो जाती हैं पलकें बोझिल
और नींद अपनी आगोश में ले लेती है
आज की रात क़यामत की रात थी
और आज का दिन काला दिन था,जो
लूट ले गया मेरी दुनिया,और मै बेखबर रही
मां की ममता चीत्कार कर रही थी
मौत को भी मानने से इनकार कर रही
दिल दर्द से इतना जल रहा था
कि आंसू सुख गए,बहना भूल गए
सिर्फ चेहरे पे चीत्कार थी,पुकार थी
हर किसी से गुहार कर रही थी ये माँ
कोई तो लौटा दो मेरी खुशियां
कैसे जियूँ तेरे बिना
काश कोई लौटा दो मेरी खुशियां
अब ये दर्द साल-दर-साल हो गया
ना कोई चमत्कार,ना ही कोई उपकार हुआ
मेरा दर्द अंतहीन बन गया
आह
काश कोई लौटा दो मेरा दिल का टुकड़ा
ज़िन्दगी भर चाकरी करूँ तेरी,काश.…
लोगों की तरस,सांत्वना नही चाहिए मुझे
मेरा ज़िगर का टुकड़ा चाहिए मुझे
काश कोई लौट दो....
एक अंतहीन इंतज़ार में बंधी ये माँ
ओ अब लौट कर नही आएगी
पर दिल ये मानने को तैयार नही
हज़ारों भुलावे दिए दिल को
पर हरबार इंतज़ार के खोज लेती है बहाने
काश कोई लौटा दो.....
अब दर्द ही हमदर्द बन गया है
यही साथी,यही सम्बल बन गया है
काश कोई लौट दो....
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
16/7/22

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