नज़र का टीका लगा देती
*लगा देती नज़र का टीका सबसे छुपा कर*
कुछ दर्द में,दुआ बेअसर होता है
काल जब प्रबल हो तो
आशीर्वाद कम पड़ जाते हैं
माना आना-जाना सब लिखा है
ईश्वर की कर्म की किताबों में
गुजरा जन्म किसने देखा है
हिसाब करना है तो कर
ये मेरे मालिक,इस जन्म का
दुखाया ना दिल हमने किसी का
अनजाने में हुई हो गलती तो
माफ़ करते इतना बड़ा ना सज़ा देते
खोजने निकली हूं यादों की गलियों में
मिलता ही नही गुनाहों का वो पुलिंदा
जाने किस अलमारी में बन्द है
दफ़न है सागर की अनन्त गहराइयों सा
उम्मीद के दरीचे पे बेचैन सी बैठी हूं
राह तक रही ना आनेवाले मुसाफिर की
बड़ा बेईमान निकले तुम
सपने दिखा छोड़ गए तन्हाइयों में
क्या कमी थी मेरे ज़ज़्बातों में,प्यार में
कर गए अकेला इस काली रात सी अंधेरे में
काश आ जाते फिर से हंसते-मुस्कराते
छुपा लेती प्यार के आंचल में
लगा देती नज़र का टीका सबसे छुपा कर।
श्रीमती मुक्ता सिंह
रंकाराज
8/2/23

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