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"प्रकृती पर्व सरहुल"

     "प्रकृती पर्व सरहुल"  सरहुल शब्द सुनते ही प्रकति प्रेमी पारंपरि वेश-भूषा में सजे मांदर की थाप पे नृत्य करते आनंद से विभोर लोग जेहन में घूमने लगते हैं । मैं  हवा  बाँधता हूँ, पानी बाँधता हूँ, धरती बाँधता हूँ आकाश बाँधता हूँ नौ जंगल दस दिशा बाँधता हूँ, लाख पशु-परेवा, सवा जड़ी बूटी  बांधता हूँ | हवा-पानी कई साथ आकाश बाँधने की बात आते ही आदिवासियों की जड़, जंगल और जमीन की समस्या मुख्य बन जाती है | इस सन्दर्भ में सरहुल विशेष महत्त्व रखता है |  सरहुल  आदिवासियों का एक प्रमुख पर्व है जो  झारखंड ,  उड़ीसा ,  बंगाल  और मध्य भारत के  आदिवासी  क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह उनके भव्य उत्सवों में से एक है। यह उत्सव चैत्र महीने के तीसरे दिन  चैत्र  शुक्ल तृतीया पर मनाया जाता है।  आदिवासी  लोग 'सरहुल' का जश्न मनाते हैं, जिसमें वृक्षों की पूजा की जाती है। यह पर्व नये साल की शुरुआत का प्रतीक है। यह आदिवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार है,और बसंत ऋतू में सखुआ फूल के फूलने के साथ ही आ...

जिंदगी में सांसे

   "जिंदगी में सांसे" जिंदगी पे सांसे हो जाती हैं भारी कभी-कभी, मेरी जिंदगी में तुम सा प्यारा, सांसे भी नहीं है , क्योंकि सांसे तो बस नुमाइश है जिंदगी की, तुम हो तो है सांसो की भी अहमियत। मेरी यादों में तो बस तुम्हारा ही बसेरा है, लफ्ज़ भी तुम्हारी ही गुलामी करते हैं, हर लम्हों पे अधिकार जताते हो तुम, कभी अपने दिल पे भी अधिकार देकर देखो। ज़िन्दगी में सांसे तो बंद मुठ्ठी की रेत है, जो फिसलती जा रही है धीमें-धीमे, तेरी नाराजगी से एक तूफान उठा है, जो न जाने क्या-क्या उड़ा ले जायेगा। हजार गीले- शिकवे भी हो जिंदगी से, हंसकर जीना फ़लसफ़ा मजबूरी है जिंदगी का, पर सांसे भी अब भारी लगने लगी है जिंदगी में। सपने तो बहुत देखी थी ज़िन्दगी तुमसे, आशाओं का दामन थामे बढ़ रही थी,  पथरीली पगडंडियों से लड़ बढ़ रही थी, न सोचा कभी देखूंगी ये रूप भी तेरा , तुम्हे  दिखेगी मेरी हर बातों में  कमी ।      .........📝श्रीमती मुक्ता सिंह

बली चढ़ी है नारी"

   "बली चढ़ी है नारी" हर युग की एक ही कहानी , समाज की बेदी पर बली चढ़ी है नारी, भारत माता हैं पर भारत की नारी है अबला, हर जगह शोशित होती हैं सिर्फ नारी, खुबसूरत हों तो जानवरों का शिकार बनती , बदसूरत हों तो परिवार पर बोझ बनती है , हर युग में समाज की बेदी पर बली चढ़ती है नारी, घर को सँभालने वाली हर गलती की है जिम्मेवार, नारी का है नही है कोई अपना अस्तित्व, नदी की तरह सागर में मिल सागर जैसी बन जाती।        ......................📝श्रीमती मुक्ता सिंह

उम्मीदें

                       "उम्मीदें" एक ख़ुशनुमा सा फ़लसफ़ा है लफ़्ज़ 'उमीदें', बड़ा सुकून है इस हसीं लफ़्ज़ 'उम्मीदें' में, एक सम्बल सा देती है जिंदगी में में ये लफ़्ज़, एक अनदेखी सी दुनिया में ये ले जाती है ये लफ़्ज़ । इस लफ़्ज़ का दायरा है बड़ा और हसीं, मानो जागती आँखों से देख रहे हों दुनिया नयी,  लोग कहते हैं की उम्मीदों पे ही दुनिया है टिकी, जहाँ उम्मीद न हो वहां सफलता है नहीं । पर इस लफ्ज 'उम्मीद' का दूसरा भी है पहलू, क्योंकि जब उम्मीदें ज्यादा बढ़ती हैं , तकलीफें भी वहीँ दरवाजा खटखटाती है, सपनो का टूटने का दर्द दीखता नहीं है, उसका चुभन जिंदगी भर के घाव दे जाता है, जिंदगी बीत जाती है इस चुभन से उबरने में।           ....................📝श्रीमती मुक्ता सिंह

वक़्त

  "वक़्त" वक़्त समय का पहिया है,जो गुजर जाता है, वक्त किसी की जागीर नहीं,वो गुजर जाता है, अच्छा हो या बुरा,हरवक्त वक़्त गुजर जाता है। क्योंकि जो गुजर गया वो वक़्त है, जो ठहर गया वो लम्हा है यादों का, अच्छे-बुरे वक़्त गुजर जाते हैं परछाइयाँ छोड़े, बुरे वक्त में ही दोस्तों की होती है पहचान, अच्छे वक़्त में तो सभी होते हैं अपने । हौसलों की भी आजमाइश करती है वक़्त, कि कितने गहरे पानी में टिकते है हम, छिछले पानी में तो सभी शेखी बघारते हैं। वक़्त किसी के लिए न रुका है न रुकेगा, उसकी फितरत में है बदल जाना हरपल, पीछे छोड़ जाता है अच्छी-बुरी यादों का खजाना। पर हम वहीँ ठहरे हैं,जहाँ तुम छोड़ गए थे, मौसम बदला, लोग बदले, बदल गया सारा जहां, पर ये वक़्त हम आज भी वही हैं ,जो कल थे, हम वहीँ ठहरे हैं जहाँ तुम छोड़ गए थे, शायद हम लम्हा बन गए हैं यादों का, तुम वक़्त ठहरे जो गुजर गए हरवक़्त की तरह।              .........📝श्रीमती मुक्ता सिंह

इंतज़ार

    "इन्तज़ार" 'इंतज़ार' एक अजीब सी अहशास है इस शब्द में , दर्द और बेचैनी से भरा एक सकून है इस शब्द में, जानते हुए भी की नहीं मिलेगा वह जिंदगी में, फिर भी एक अजीब सा इंतज़ार है जिन्दगी में। किसी न किसी का तो सभी करते हैं इंतजार जहाँ में, वो ख़ुशनसीब हैं, जिनका इंतजार सफल होता है, ख़ुशनसीब वो भी हैं ,जिनके भाग्य में इंतजार हो। जीने की ख्वाहिश में हर रोज़ मरते हैं लोग, वो आये ना आये "इंतज़ार" करते हैं लोग, क्या खूब कहा है किसी ने- "झूठा ही सही मेरे हमदम तेरा वादा, पर आज भी हम उनपर एतबार करते हैं, तू आये या न आये हम आज भी इंतज़ार करते हैं", एक दिन इंतजार में ऐसा भी दिन आएगा, तेरे दिल में इंतज़ार की लकीर छोड़ जायेंगे, ढूंढते फिरोगे तुम भी हमें इंतजार में एक दिन, आँखों में यादों की नमी छोड़ जायेंगे एक दिन, दिल में दर्द की वज़ह छोड़ जायेंगे एक दिन, तुम भी करो इंतज़ार सबब छोड़ जायेंगे एक दिन, जिंदगी में हमदम की कमी छोड़ जायेंगे एक दिन। ....................📝श्रीमती मुक्ता सिंह