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माँ शब्द है अनमोल

    "माँ शब्द है अनमोल" माँ शब्द है अनमोल, जिसका नहीं है कोई मोल, एक माँ शब्द में समाया सारा संसार है, क्योंकि सृष्टी की रचना भी माँ ने ही की है, हर रचना के  बस माँ ही है रचनाकार। माँ उच्चारण करते ही, साकार होती है एक तस्वीर, आंचल में ममता लिए ,नैनों से आंसु पिए , सौंप दे जो पूरा जीवन, बच्चों के लिए, आँखों में हो उनके बस एक ही सपना, उज्जवल भविष्य हो बच्चों का हमारा, यही दिन-रात करती है बस कामना, क्योंकि उसके दिल में है ममता, और लबों पे है बस दुआ ही दुआ। माँ तू कुदरत की है वो अनमोल रचना, जिसकी बाँहें हमे बचाये सारी मुसीबतों से, क्योंकि माँ का दामन होता है पहरा, जो  छीनने नहीं देती बच्चों का सुकून , क्योंकि तुम्हारे गोद में  मिलता है हमे , स्वर्ग से भी ज्यादा खुशियाँ । क्योंकि माँ तू है , अटल,अजर, अमर और लगन, और है तू वह अगन और वह तपन, जिसका जीवन धुरी घूमता बच्चों के लिए, इसलिए माँ तू हमारे लिए है अनमोल रत्न । एक माँ जब थक जाती है , फिर बदलती है रूप नया, लेती है फिर से धरा पे जन्म, माँ बन जाती है फिर बेटी , और करती है फिर वही ल...

"ख्वाहिशों का काश"

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   "ख्वाहिशों का काश" काश एक हसीं अल्फाज है जो, मन में आशा की किरण बन चमकता है , और लगता है की काश ऐसा हो जाता ! ख्वाब हकीकत में बदल जाता, और मुश्किल वक्त लम्हों में गुजर जाता । जिंदगी में ख्वाहिशों की नही है मंज़िल, कुछ पूरे कुछ अधुरे और कुछ खास, ना जाने इनमे कितने है काश शामिल, काश कास के फूलों की तरह हवा में बिखर जाते है, और कुछ आज भी अटके हैं पूरे होने के जिद में । काश ख्वाबों का वह जाल है, जिसमे सपने सुहाने मकड़जाल है, और हकीकत पथरीली पगडण्डी। पर हमें है काश को हकीकत बनाना, सपनो को साकार कर धरातल पर उतारना, पुरे होने की आश में काश को मंजिल दिलाना, क्योंकि साँस थम जाती है एक आस टूट जाने से, क्योंकि ख्वाहिशों की नहीं है कोई मंजिल,  और ख्वाहिशों का काश का आस गहरा होता है ।                       ............📝 श्रीमती मुक्ता सिंह

"लफ़्ज"

    "लफ़्ज" लफ़्ज वो समंदर है, जिसकी न कोई सीमा है, ना गहराई का अंदाज है । लफ्ज़ो के तीर से हुए महाभारत, लफ्ज़ो के मायाजाल में हुआ राम वनवास, लफ़्ज़ों के अल्फाजों में घिरा सारा संसार, क्योंकि लफ्ज़ो के समंदर का न है कोई किनारा । जबां खामोश हो तो नजर को लफ़्ज दीजिये, क्योंकि अक्सर लोग जबां नहीं नज़र पढ़ते हैं, और लफ्जों के खामोशियों में वो असर होते हैं, कि जब करवटे बदलते हैं तो क़हर बरसाते हैं, इसीलिए लफ़्ज़ों को संभाल कर अल्फाज बनाइये। क्योंकि जब लफ़्ज अल्फ़ाज बन जाते हैं तो, तरकस से निकले बाण बन जाते हैं, जो लाख चाहने पे भी वापिस नहीं होते हैं।                                   ...........📝श्रीमती मुक्ता सिंह

उनकी आँखें

     "उनकी आँखें" शब्द मौन हैं तो क्या उनकी आँखे बोलती हैं पढ़ने वाला नज़र चाहिए । प्यार करने के भी अलग अलग सलीके हैं, आँखों में नमी हो तो, गम हो जरुरी नहीं, खुशियों में भी सैलाब बहा करते हैं । आँखों-आँखों से बात व् मुलाकात तो हो जाती है, लेकिन बड़ा मुश्किल होता है वह पल, जब किसी की ख़ामोशी सवाल कर जाती है। उनकी आँखों के अंदाज़ बड़े ही गहरे हैं, उन दिलकश आँखों के ख्वाब बड़े गहरे हैं, छुप-छुप के न जाने क्या देखते हैं, जैसे कोई खज़ाना छुपाने की हो कोशिश, और नज़रे झुकाये मुस्कराते रहते हैं । उनकी आँखों की तारीफ़ है बमुश्किल, झील सी आँखों में समंदर छिपाये बैठे हैं, चेहरे पे मुस्कराहट, आँखों में तूफान हो जैसे, लोगों में खुशियों के तोहफे लुटाए बैठे हैं , उनकी आँखों की तारीफ़ में क्या कहूँ, उसके लिए शायरों के लफ्ज कम पड़ जाते हैं। रात की गहराइयों और मेरी तन्हाइयों में, उनकी आँखों के वो समंदर याद आते हैं, और उनकी मजबूरी और कमी याद कर, हलके-हलके पलकों से ढल जाती हैं ।            ...

"प्रकृती पर्व सरहुल"

     "प्रकृती पर्व सरहुल"  सरहुल शब्द सुनते ही प्रकति प्रेमी पारंपरि वेश-भूषा में सजे मांदर की थाप पे नृत्य करते आनंद से विभोर लोग जेहन में घूमने लगते हैं । मैं  हवा  बाँधता हूँ, पानी बाँधता हूँ, धरती बाँधता हूँ आकाश बाँधता हूँ नौ जंगल दस दिशा बाँधता हूँ, लाख पशु-परेवा, सवा जड़ी बूटी  बांधता हूँ | हवा-पानी कई साथ आकाश बाँधने की बात आते ही आदिवासियों की जड़, जंगल और जमीन की समस्या मुख्य बन जाती है | इस सन्दर्भ में सरहुल विशेष महत्त्व रखता है |  सरहुल  आदिवासियों का एक प्रमुख पर्व है जो  झारखंड ,  उड़ीसा ,  बंगाल  और मध्य भारत के  आदिवासी  क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह उनके भव्य उत्सवों में से एक है। यह उत्सव चैत्र महीने के तीसरे दिन  चैत्र  शुक्ल तृतीया पर मनाया जाता है।  आदिवासी  लोग 'सरहुल' का जश्न मनाते हैं, जिसमें वृक्षों की पूजा की जाती है। यह पर्व नये साल की शुरुआत का प्रतीक है। यह आदिवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार है,और बसंत ऋतू में सखुआ फूल के फूलने के साथ ही आ...

जिंदगी में सांसे

   "जिंदगी में सांसे" जिंदगी पे सांसे हो जाती हैं भारी कभी-कभी, मेरी जिंदगी में तुम सा प्यारा, सांसे भी नहीं है , क्योंकि सांसे तो बस नुमाइश है जिंदगी की, तुम हो तो है सांसो की भी अहमियत। मेरी यादों में तो बस तुम्हारा ही बसेरा है, लफ्ज़ भी तुम्हारी ही गुलामी करते हैं, हर लम्हों पे अधिकार जताते हो तुम, कभी अपने दिल पे भी अधिकार देकर देखो। ज़िन्दगी में सांसे तो बंद मुठ्ठी की रेत है, जो फिसलती जा रही है धीमें-धीमे, तेरी नाराजगी से एक तूफान उठा है, जो न जाने क्या-क्या उड़ा ले जायेगा। हजार गीले- शिकवे भी हो जिंदगी से, हंसकर जीना फ़लसफ़ा मजबूरी है जिंदगी का, पर सांसे भी अब भारी लगने लगी है जिंदगी में। सपने तो बहुत देखी थी ज़िन्दगी तुमसे, आशाओं का दामन थामे बढ़ रही थी,  पथरीली पगडंडियों से लड़ बढ़ रही थी, न सोचा कभी देखूंगी ये रूप भी तेरा , तुम्हे  दिखेगी मेरी हर बातों में  कमी ।      .........📝श्रीमती मुक्ता सिंह