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तिरंगा भी रो पड़ा

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 तिरंगा भी रो पड़ा इतिहास भी धूमिल हो गया तिरंगा भी रो पड़ा जय जवान,जय किसान का नारा भी लज्जित सा मुंह छुपाए उपद्रवियों के शोर में  औंधे मुंह लाल किले के प्राचीरों से जवानों के साथ गिर गिर कर  इस ज़लज़ले से लहूलुहान हो गया किसानों के हाथों में कब हल बरछी बन गया वृषभ को हांकने वाले हाथ ट्रैक्टर से तोड़-फोड़ करने लगे जुआठों से बीजों को ढंकने वाले घोड़े पर चढ़ तांडव मचाने लगे चाबुकों को प्यार से चलाने वाले  'अन्नदाता' के भेष में अब  उपद्रवी नंगी तलवारें चलाने लगे ये देख तिरंगा भी रो पड़ा 'अन्नदाता' कब यमराज बन मौत बरसाने लगे जो किसान थे हमारे देश के गौरव अब भारत माता की इज्जत धूमिल कर गए गणतंत्र के इस पावन पर्व पे  पूरी दुनिया मे अपनी माता को शर्मशार कर दिए  फ़टी इज्जत की झीनी ओढ़नी में  भारत माता मुंह छुपाए रो रही जार-जार ये देख तिरंगा भी रो पड़ा जिस तिरंगे की शान में  कितने शहीद बलिदान हुए आज उसी तिरंगे को उतार कर  खालिस्तान के झंडे को फहराने लगे भारत की पवित्र भूमि कभी फक्र करती थी अपने सपूतों के खून से सींचे आज़ादी को आज आज़ादी के नाम पर ये तांडव से ...

कम हो या ज्यादा

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    # कम हो या ज्यादा# कम हो या ज्यादा गम हो या खुशी हर परिस्थिति में ढलना चाहिए चेहरे की शिकन को  मुस्कराहटों की ओट में छुपाना चाहिए। आते हैं लोग हमराज़ बनकर गमों की सौगात भी लाते हैं तेरी खुशियों से जलन और तेरी गमों से दोस्ती निभाते हैं । बिरले ही लोग ऐसे होते हैं जो दोस्ती में  नफा-नुकसान भूल जाते हैं खुशकिस्मती के इस अहसास की आ हम नई शुरुआत करें गमों को उधार ले खुशियों की सौगात दें । श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 2/12/20

शुभ दीपावली

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 नमस्कार🙏🏻जोहार🙏🏻खम्मागन्नी सा🙏🏻 आप सभी को पंच दीपावली की बहुत सारी शुभकामनाएं🙏🏻 स्वागत में मां के हर द्वार पे बन्दनवार सजा गढ़ती घर की लक्ष्मी सुंदर मनभावन रंगोली दीपों से सारा संसार सजा। उल्लसित मन दीपों के उजाले में नव घर,नव वाहन खरीदते साज-सज्जा सब पर मिट्टी के दीपों में है किसी का पसीना आशाओं की रौशनी से सजा लो घर-द्वार अपना। श्रीमती मुक्ता सिंह 15/11/20 रंकाराज

जिंदगी तेरे रंग बहुत देखे

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 नमस्कार🙏जोहार🙏खम्मागन्नी सा🙏 आज मै हर किसी के जिंदगी की सच्चाई को कलमबद्ध करने की कोशिश की हूं और आशा करती हूं कि आपको पसंद आएगी। *ज़िन्दगी तेरे रंग बहुत देखे* ज़िन्दगी तेरे रंग बहुत देखे झूठी खुशियों की चाह में सबकुछ लुटा के भी देखे हम बदले पूरी तरह पर तेरे तेवर ना बदले । तू तो ठंढे पानी मे खड़े उस बुजुर्ग की आशा बने सुदूर टिमटिमाते बल्ब की रौशनी की गर्मी की तरह रही जो उम्मीद बन चमकती तो रही पर मिली कभी भी ना ज़िन्दगी तेरे रंग बहुत देखे । कुछ अपने देखे,कुछ अपनापन देखे कुछ अपनापन का चोला ओढ़े देखे हम भी मुस्कराये हर पल तेरे हर रंग को समेटते रहे पर खुशियों की चाह में  बोझिल सा है अब मन मेरा अकेले में एक बूंद में  ढलक जाता है विश्वास कहीं ज़िन्दगी तेरे रंग बहुत देखे । अब बस कर थोड़े हंसी के फ़व्वारे में भीगने दे तुझे अपनी मर्ज़ी से जीने दे बहुत करवटें बदले तेरी चाहत में अब चैन की नींद सोने दे ज़िन्दगी तेरे रंग बहुत देखे। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 28/10/20

तस्वीर

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 नमस्कार🙏जोहार🙏खम्मागन्नी सा🙏।आज हमारे एक परिचित ने हमारी शादी के कुछ महीने बाद कि एक तस्वीर हमें भेजी।जिससे काफी यादें जुड़ी हुई थी हमारी।बहुत अच्छा लगा।उसी पे मेरी ये रचना है।आशा है कि आपको भी पसंद आएगी। *तस्वीर * आज किसी ने भेजी है हमारी यादों की तस्वीर पुरानी बन्द पड़े थे जो जज्बात अल्बम के पन्नों में आज किसी ने वो अहसास भेजा है। जिंदगी के उधेड़-बुन में खो गए थे वो सुनहरे लम्हें कहीं आज किसी ने वो अनमोल लम्हात भेजा है। क्या दिन थे वो भी  अनजाने राह के हमराही थे हम कुछ उन्हें समझना था,कुछ हमें समझना था आज किसी ने वो शुरुआत भेजा है आज को समझने-समझाने में  कब बीत गया वो सुनहरा कल कल की चिंता में बिखर गए वो पल आज किसी ने वो पलों का सौगात भेजा है। समय बदला,लोग बदले,रिश्ते बदले बागों में प्यार के फूल भी खिले कुछ तुम बदले,कुछ हम बदले पर बदला नही हमारा विश्वास आज किसी ने वो,विश्वास की शुरुआत भेजा है। ये तस्वीरें थी तो मेरे पास भी बन्द अल्बम के पन्नो में इंतज़ार करती कभी फुर्सत नही मिली, तो कभी बन्धनों को निभाते रहे आज किसी ने इंतज़ार की वो याद भेजा है। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकार...

बारिश

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 नमस्कार🙏जोहार🙏खम्मागन्नी सा🙏आज मैं अपनी भतीजी की उस निश्छल चिंता को चित्रित करने का प्रयास की हूं।आज मैं मोबाइल की गैलेरी में फ़ोटो देख रही थी तो अनायास ही यह अहसास जीवंत हो उठी जिसे मैंने शब्दबद्ध करने की कोशिस की हूं।            बारिश मैं टहल रही थी आंगन में प्रफुलित सी सँजो रही थी बारिश की बूंदों को अंतर्मन तक तभी छोटी-छोटी डग भरती दौड़ती आई पायल की रुनझुन से मंत्रमुग्ध करती आई। तुतलाती जबां में मेरा ही नाम पुकार रही थी बुआ-बुआ,मैं आ गयी नही तो आप भीग जाती हाथों में उसके उससे बड़ी छतरी थी चेहरे पे भोली मुस्कान और थी निश्छल चिंता। उसे देख बचपना मन मे अंकुरण लेने लगी उस पल उसकी बातों से बचपन में हम खो गए वो और हम दोनों जैसे एक हो गए वो थोड़ी बड़ी बन गयी,मैं थोड़ी बच्ची बन गयी। फिर बारिश की बूंदों से हम दोनों खूब खेले न डर था सर्दी जुकाम का,न डर बुखार का बस जी लेना चाहते थे इस पल-पल को। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 4/10/20