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दिव्यता का सफर

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 *दिव्यता का सफर* दिए की लॉ में भी न थी इतनी रौशनी जो रौशन कर सके तेरे दर्प को वो भी उधार मांग रही हो जैसे तुझसे दिव्यता प्रकाश की दिव्य आभा लिये दिव्यता के सफर पे चली गयी तुम छोड़ गई अपनी माँ को यादों के अंधेरे में देहरी खड़ी दिल-ही-दिल पुकारती हूं तेरे दिव्यता की रौशनी की झलक ढूंढती हूं काश समय चक्र उल्टा घूम जाता समेट लेती बांहों में,छुपा लेती अंकों मे चट्टान बन जाती तेरी दिव्यता के सफर में श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 24/6/23

नींद और ख्वाब के दरमियाँ

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 *नींद और ख्वाब के दरमियाँ नींद और ख्वाब के दरमियाँ बस तेरे-मेरे अफ़साने हैं याद इतने आते हो कि,तारे गिनते कब सहर हुई पता न चला और ख्वाबों में जो तुम आये रात बैरी बन सुबह में बदल गयी नींद और ख्वाब के दरमियाँ बस तेरे-मेरे अफ़साने हैं इंतजार में नींद रूठी रही हम मनाते रहे, और मेरे ख्वाबों पे तो तेरा ही हुकूमत है नींद और ख्वाब के दरमियाँ बस तेरे-मेरे अफ़साने हैं चाँद भी लुकछुप अठखेली करता नज़र रखता है हमारी वेचैनियों पे नींद तो सौतन बन ही बैठी है ख्वाब भी आंखे दिखाता है। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 11/6/23  

एक बार आजा

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 *एक बार आजा* संतप्त ह्रदय तेरे विरह वेदना में जल रहा चंचल नयन तेरे इंतज़ार में सुप्त हो रहा तुम निर्मोही इस कदर रूठे कि मनाने की सारे रास्ते बंद कर गए लोग कहते हैं ना देखूं तेरा रास्ता तुम अनजाने रास्तों में खो गए  पर मेरे ह्रदय को कैसे समझाऊं,जो हर पल धड़कता तेरे आने की आस लिए दुनिया मे कई चमत्कार हैं होते एक चमत्कार होता और हम-तुम साथ होते सपनो के पंख लगा ढूंढती हूं हरजगह  पर जाने तुम किस ओट में हो छुपे हुए एक बार आजा मुस्कराते हुए छुपा लुंगी,सबकी नजरों से बचाते हुए श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 22/3/23

छोड़ गए निर्मोही बनकर

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 छोड़ गए निर्मोही बनकर लोग समझते हैं  मैं सम्भल गयी हूं दुनियादारी में रम गयी हूं पर उन्हें क्या पता ये तो मेरे कर्तव्य पथ के बिखरे मोती हैं जिन्हें मैं पिरोती हूं  चेहरे पे झूठी मुस्कान लिए पर मेरा दिल आज भी ठहरा है उसी बन्द दरवाजे के पीछे जहां छोड़ गए तुम  निर्मोही बन कर। बहुत मनाती हूं दिल को समझाती हूं तेरा अक्स ढूंढती फिरती हूं प्यार लुटा बनाना चाहती हूं अपना पर जब तुम ही अपना ना हो सके तो  परायों से क्या गिला-शिक़वा करूँ मेरा दिल इंतज़ार करता है तेरा उस बन्द दरवाजे के पीछे जहाँ छोड़ गए तुम निर्मोही बन कर। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 16/3/23

मुस्कराहटें उधार मांग लाई हूं

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 *मुस्कराहटें उधार मांग लाई हूं* जरूरी नही,जिनके चेहरे पे हंसी हो उनके दिलों में गमों का सागर न हो । कुछ मुस्कराहटें उधार मांग लाई हूं गमों ने इतना कंगाल किया  थोड़ी देर,दोस्तों की महफ़िल में बैठ यादों को आग़ोश में छुपा लेती हूं तुम सपने दिखा,दगा दे गए भरी महफ़िल में शुक्रिया तेरा ये मेरे दिल-ए-अज़ीज़ जी लुंगी,तेरी तस्वीरों से बात करते हुए शुक्रिया,शुक्रिया,शुक्रिया तेरा श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 18/2/23

नज़र का टीका लगा देती

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 *लगा देती नज़र का टीका सबसे छुपा कर* कुछ दर्द में,दुआ बेअसर होता है काल जब प्रबल हो तो  आशीर्वाद कम पड़ जाते हैं माना आना-जाना सब लिखा है ईश्वर की कर्म की किताबों में गुजरा जन्म किसने देखा है हिसाब करना है तो कर ये मेरे मालिक,इस जन्म का दुखाया ना दिल हमने किसी का अनजाने में हुई हो गलती तो माफ़ करते इतना बड़ा ना सज़ा देते खोजने निकली हूं यादों की गलियों में मिलता ही नही गुनाहों का वो पुलिंदा जाने किस अलमारी में बन्द है दफ़न है सागर की अनन्त गहराइयों सा उम्मीद के दरीचे पे बेचैन सी बैठी हूं राह तक रही ना आनेवाले मुसाफिर की बड़ा बेईमान निकले तुम सपने दिखा छोड़ गए तन्हाइयों में क्या कमी थी मेरे ज़ज़्बातों में,प्यार में कर गए अकेला इस काली रात सी अंधेरे में काश आ जाते फिर से हंसते-मुस्कराते छुपा लेती प्यार के आंचल में लगा देती नज़र का टीका सबसे छुपा कर। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 8/2/23