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आज मैंने देखा एक आत्मविश्वास

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*आज मैंने देखा एक आत्मविश्वास* वो ठेले को ठेलती जिंदगी अद्ध ठेली, माथे पे सिकन और चेहरे पे विश्वास, आज देखा मैंने एक आत्मविश्वास । दुनिया से बेखबर, माथे पे चिंता की लकीरें, थी उस चिंता अपनी मेहनत की कमाई की, नज़र व्यापार पे और आंखो में सपने, आज मैंने देखा एक आत्मविश्वास । वो ठेला नहीं था ,थी उसकी थाती, बच्चों के सपने स्वाभिमान की महक, वो ठेले को नहीं सपनों को ठेल रही थी, स्वाभिमान की महक सजी थी उस ठेले पे, आज मैंने देखा एक आत्मविश्वास । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 17/7/19

दोस्ती को ना तौल

*"दोस्ती को ना तौल"* रिश्ते के तराजू में दोस्ती को ना तौल ये दोस्त, मै हनुमान नहीं जो दिल चीर के तेरा नाम दिखा दूं, हर रिश्ते ने गम दिया है दोस्ती ने भी नाता तोड़ लिया है, मै ना सीख पाई दुनियादारी की रिवायतें, बस दिल की सुनी और चल पड़ी कांटो में फूल ढूंढने, जख्मों से पैर छलनी है पर मंजिलों की आस बनी है, बस अब बस टूट गए होसले, ना रही अब किसी से शिकवा ना शिकायतें, सब खुश रहें यही है दुआ बस अब रब से, क्या खूब कहा है किसी ने - "किसी के बिना रुकती नहीं जिंदगी , और अपनों के बिना कटती नहीं जिंदगी।" श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 22/6/19

बारिश की बूंदें

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   Rewrite     *बारिश की बूंदे* रात की गहरी होती खामोशियां, जैसे स्याह सी निस्तब्धता बढ़ा रही हो, बारिश की बूंदे भी धीरे से धरती को आगोश में ले रही हैं। इन बूंदों की भी है अजीब साजिशें, प्रेमी दिलों मे बेचैनीयां बढ़ा रही हो जैसे, इस सन्नाटे में तुम्हारी यादों का कारवां, ठंडी हवा सी तन मन को सिहरा रही हैं, काश कि तुम इस रात में होते यहां, मै तेरी बांहों में खुद को भूल जाती, तेरे प्यार के सुरक्षा कवच में खो जाती, उस एहसास की शिद्दत से याद आ रही है। इन बूंदों की भी है अजीब साजिशें, अपनी बूंदों से प्रेमियों को भिगोती है इस कदर, वो तड़प जाते हैं रेगिस्तान में मृगमारिचिका सी, मेरी धड़कनो पे तो तेरे नाम का यूं पहरा है, कि मेरी सांसों में भी तेरी खुशबू बसती है, फिर सोचती हूं क्या तुम भी तड़पते हो मेरी तरह, क्या ये बूंदे तेरे दिल में भी टीस भर जाती हैं, पर कहा गया है प्यार तो निस्वार्थ होता है। बारिश की बूंदों और यादों का है गहरा नाता, वो धीरे से बरसती हैं और प्रेमी तड़पते हैं, तुम खुश रहो सदा ये दुआ है मेरी, तुम याद करो ना करो नहीं हैं बंदिशें, ...

अनोखा है ये दिलों का बंधन

*"अनोखा है ये दिलों का बंधन"* अनोखा है ये दिलों का बंधन, सात फेरे,काले मोती और सिंदूर , इनसे बंधा है ये अनोखा बंधन, कुछ मंत्रोच्चार ने दिलों को जोड़े, पाणिग्रहण की रस्म ने कराया था एहसास, तेरे पहले स्पर्श का एहसास था अनोखा, सात फेरे सात वचन में बंध गए हम । कैसा है ये अनोखा अनमोल बंधन, सारी खुशियां मिल गई तुझको पाकर, जिंदगी संवर गई तेरे पहलू में आकर, तेरे बिन अब एक लम्हा भी गुजरता नहीं, मेरे धड़कनों पे भी अब राज तुम्हारा है। कैसा है ये अनोखा दिलों का बंधन, गृहस्ती हमारी चल रही थी यूं ही, रिश्ते बढ़े जिम्मेवारियों बढ़ी, पर प्यार ना हुआ हमारा कम, पर जिम्मेवारियों ने लिया ये कैसा पलटन, ना चाहते हुए भी हम दूर हो रहे हैं, आहिस्ता आहिस्ता बढ़ रही मजबूरियां, कैसे रहेंगे हम तेरे बिन हमदम, कहीं निकल ना जाए प्राण हमारे, तुम बिन वो हमसफ़र । कैसा है ये अनोखा दिलों का बंधन, अजीब है ये दिलों का भी रिश्ता, अब तुम और मै ना रहे, होकर हम, अब तुम ही मेरी जिंदगी हो, धड़कनों की आवाज भी तुम ही हो, कैसा है अनोखा हमारा बंधन । श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 29/6/19

बीवी को चाहिए टीवी और भाई को चाहिए बीवी

बीवी को चाहिए टीवी और भाई को चाहिए बीवी आज बच्चों के साथ बैठ कर कौन बनेगा करोड़पति देख रही थी ।मेरा छोटा बेटा को ये क्विज़ पे आधारित है इसलिए बहुत पसंद है । वो इस प्रोग्राम के समय चैनल बदलने नहीं देता ।और घर बैठो मोबाइल पे खेलता है ।उसमे एक प्रतिभागी आये थे , उनके बारे में बताते हुए माननीय अमिताभ बच्चन जी ने कहा की इनको चाहिए बहुत सारे पैसे और बीवी ।पता नहीं क्यों मुझे उनके इतना कहते ही अपने बचपन की एक बात याद आ गयी और हंसी आने लगी ।साथ ही अपने पाप जी को याद कर आँखे भी भर आई । बात बहुत पुरानी है उस समय हम बहुत छोटे थे और अचानक ही पापा जी कहीं से आये और बोलने लगे " बीवी को चाहिए टीवी और भाई को चाहिए बीवी" बहुत परेशानी है इस जिंदगी में ।हम बच्चे उनकी बात को सुनकर मुस्कराने लगे ।वैसे तो हम अपने पापा जी के सामने भी नहीं जाते थे बचपन में ।बहुत डरते थे जबकि पापा जी हमे बहुत प्यार करते थे।गगर में हमारा ही राज़ चलता था ।हमारी  बात घर में कोई नहीं उठाता था ।जो हमारी बात नहीं रखता उसकी खैर नहीं होती ।जिससे मेरे भाई मुझसे बहुत चिढ़ते थे । बात ऐसी थी की उस समय सभी जगह वो एंटीना वाला दूरद...

कर्मा पूजा

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कर्मा पूजा करमा पूजा सरहुल महोत्सव की तरह ही प्रकृति की पूजा है ।यह छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के आदिवासियों का एक प्रमुख त्योहार है। जो कि भादो  मास की एकादशी के दिन(लगभग सितम्बर में) और कुछेक स्थानों पर उसी के आसपास मनाया जाता है। इस मौके पर आदिवासी करम के पेड़ की डाल को अखरा में रोपित कर प्रकृति की पूजा कर अच्छे फसल की कामना करते हैं, साथ ही बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए प्रार्थना करती हैं। इस मौके पर एक बर्तन में बालू भरकर उसे बहुत ही कलात्मक तरीके से सजाया जाता है। पर्व शुरू होने के कुछ दिनों पहले उसमें जौ डाल दिए जाते हैं, जिसे कोपलित होने के बाद 'जावा' कहा जाता है। यही जावा आदिवासी बहनें अपने बालों में गूंथकर कर पूजा करती हैं । इस अवसर पर सभी आदिवासी जनजाति महिला -पुरुष ढोल और मांदर की थाप पर उल्लास पूर्वक झूमते-गाते हैं। यह दिन इनके लिए विशेष होता है , जिसके कारण सभी सभी उल्लास से भरे होते हैं। इनकी परम्परा के मुताबिक, खेतों में बोई गई फसलें बर्बाद न हों, इसलिए प्रकृति की पूजा की जाती है। इस दिन आदिवासी बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए व्रत रखती हैं। और इनके भाई ...