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देश टूटा अहंकार में

"देश टूटा अहंकार में" ईश्वर से चले पहचान में बदले, देश से चले राज्य में बदले, राज्य से चले गांव में बदले, गांव से चले मोहल्ले में बदले, मोहल्ले से चले परिवार में बदले, परिवार से चले व्यक्ति में बदले, हम विराट से चले थे और शून्य में बदल गए, क्या हम शून्य से विराट की ओर चल पाएंगे, हमारी कट्टरता ना जाने हमे ले जायेगी, यह हमारा विकार है अहंकार है, संस्कार तो खो गए कही कट्टरता में, आज हम कुछ भी ना रहे इस विचार में, संस्कार खो गए कहीं इस विचार में, पहचान छूटी गांव छुट्टा प्रान्त छूटा देश टूटा इसी अहंकर में । श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज

कार्यकर्ता की दर्द भरी चिट्ठी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षा मंत्री के नाम

माननीय प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री जी विषय - झारखंड चुनाव के गलत उम्मीदवार चुनाव संबंध में । माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, गृहमंत्री श्री अमित शाह जी, रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह जी । मै पार्टी कि एक साधारण कार्यकर्ता हूं।जो हर वक्त पार्टी के उज्ज्वल भविष्य की ही कामना करती हूं ।और केंद्र के कार्यों से काफी फक्र महशूस करती हूं कि इस पार्टी की कार्यकर्ता हूं ।मै अपनी बात क्षमा याचना के साथ शुरू कर रही हूं कि मेरी बात से अगर पार्टी की छवि पे आघात हो तो कृपया मुझे क्षमा करेंगे । पर इस बार उम्मीदवारों की घोषणा से अपने आप को काफी आहत महशुस कर रही हूं ।क्यूंकि झारखंड क्षेत्र में ज्यादातर जिलों में कार्यकर्ता या तो दो भागों में बंट गए हैं या उनमें असंतोष ने गहरी पैठ बना ली है।क्यूंकि हम कार्यकर्ता पार्टी के लिए निः स्वार्थ भाव से कार्य करते हैं ।और जब हमारी लगाम किसी ऎसे व्यक्ति के हाथो में सौंप दिया जाता हो, जो कि या तो बाहर से आयातित हो, या भ्रष्टाचार में लिप्त हो, या लोकसभा चुनाव में खुलकर पार्टी का विरोध किया हो, या हमारे राष्ट्रीय स्वंसेवक को उम्मीदवारी घोषित...

फिर से हम बच्चा जाए

"फिर से हम बच्चा जाए" चलो आज फिर से हम बच्चा जाए कटोरी भर के दूध पाउडर खाएं चॉकलेट दिखा के दोस्तों को लालचाएं आज फिर से डंडे चोट से गीली उड़ाएं । चलो आज फिर से बच्चा बन जाएं पिट्टो की गोटी को हवा में उछालें पतंग की डोरी को फिर से ड्ढिल दे दें कबड्डी में अपनी पैठ बनाएं । चलो आज फिर से बच्चा बन जाएं दोस्तों में शहनसां बन जाएं वो कागज़ की कश्ती फिर से चलाएं बारिश की पानी में ओले उठाएं । चलो आज फिर से बच्चा बन जाएं वो इमली की तीखी चटपटी यादें बनाएं आम की टिकोली का घुमाउल बनाएं डोला - पत्ता में सबको हराएं सावन में पेड़ों पर झूला लगाएं। चलो आज फिर से बच्चा बन जाएं । श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 15/7/19

दरका होगा तेरी बातों से"

" दरका होगा तेरी बातों से" कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से, "मां तुम तो पागल हो जाती हो, लगता है जैसे जान से ही मार डालोगी", मेरे दिल के टुकड़े कैसे मै दिखाऊं तुझे, मां के दिलों में तो है बस प्यार का सागर, जमाने की नज़रों से बचाने की बेकरारी, ना है कोई ईर्ष्या, ना है कोई द्वेष । कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से, माना कि इक्कसवीं सदी में हैं हम, जहां है इंटरनेट का बोलबाला, ना साथियों का इंतज़ार खेलने के लिए, ना समय की है पाबंदी घर आने के लिए, क्योंकी बच्चे घर में रहते भी हैं अकेले, नेट ही है उनका परिवार और संसार । कितना कुछ दरका होगा तेरी बातों से, क्यूंकि कैसे देखूं तुझे अपनी जिंदगी खोते, वर्षों का तजुर्बा है, जमाने की नियतों का, कैसे बताऊं इस डब्बे के बाहर भी है दुनिया, इस दुनिया और उस दुनिया के कायदे है अलग, पग पग पर है जाल बिछा कांटों का, चादरें हैं फूलों की, और सेज सज़ा कांटों का। श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 12/11/19

शरद पूर्णिमा

 🌕शरद पूर्णिमा🌕 आज चांद है पूरे यौवन में, सोलह कलाएं धारण किए, कर रही है अठखेलियां, लोग भी है टकटकी लगाए, अमृत किरणों की हैं आस लगाए । चंदा भी ऊपर से सभी को देख मुस्काए, आज ही के दिन कृष्ण ने कि थी लीलाएं, गोपियों संग वृंदावन में रचाया था महरास। आज ही के दिन जन्म लिए थे महा ऋषि, भृगु वंश में जन्म ले ,भिलों के संग पले, डाकू से महर्षि बन काव्य की रचना किए, संस्कृत में पहला काव्य रामायण लिखे, दुनिया को संस्कृति की पहचान दिए । मां लक्ष्मी को भी है ये दिवस प्रिय, शरद ऋतु के शुरुआत की ये पहचान है, शरद पूर्णिमा का एक अपना मान है । श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 13/9/19

डर

"डर" जब भी जुबान पे मुस्कराहटों ने आहट दी, जमाने की तीखी नज़रों ने बिंध डाला खुशियों को, खुशियों की आने की आहट अभी सुनी ही थी हमने, कि गमों की आंधियों ने डेरा डाल दिया । कलियां भंवरों की गुनगुन से हुई ही थी प्रस्फुटित, कि आंधियों के थपेड़ों ने चमन ही उजाड़ डाला, कुदरत का ये कैसा बदला है मिजाज़, कि पतझड़ में बरसात का तूफ़ान आ गया, बहारे चमन में बवंडर का तांडव हो गया । अब बगिया को है इंतज़ार बहार का, पर मन के एक कोने में डर भी है समायी सी, कि कहीं बाहर के आने के पहले ही, चमन ना लूट जाए , बसंत हो जाए बेवफ़ा, साथी तूफ़ान ना बन जाए । श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 19/9/19