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भुला ना सकेंगे तेरी शहादत

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"भुला न सकेंगे तेरी शहादत" भुला न सकेंगे हम गलवानघाटी के तेरे बलिदान को तेरे साथ हुए धोखे को । भुला न सकेंगे हम तेरी शहादत से मिली हिफाज़त को। वतन की खातिर शहादत करते तेरे अरमानों को। देश की खातिर मर मिटने के तेरे जज़्बातों को । तुम जब तिरंगे में लिपटे पहुंचे होगे अपने आंगन । नमन करने को उमड़ पड़ा होगा सारा वतन । तब तुम आसमां में भी बैठ कर रहे होगे वतन को नमन । फक्र है हमे तेरी बहादुरी पे और रोष है दुश्मनों की धोखाधड़ी पे । पर वो क्या जाने हमारे वीरों के हौसले को आज मन ही मन दुश्मन भी कर रहा होगा तेरी बहादुरी को नमन। भुला न सकेंगे हम गलवानघाटी के तेरे बलिदान को कई अरमान लिए तेरे शहादत को। उस गीली मेहंदी को जो अब रच रही तेरे बलिदानों से। उस मां के हौसलों को जिसने बड़ी आशीषों के साथ भेजा था तुझे सरहद की सुरक्षा को । उस पिता के हिम्मत को जिसने परिवार की जिम्मेवारियों से मुक्त कर भेजा था तुझे देश की सीमा की जिम्मेवारियां दे । उस बहन को जिसने तुझे राखी बांध कसम ली थी देश की सुरक्षा की । उस जन्मभूमि की मिट्टी को जिसके धरती पे जन्म लिए थे तुम जै...

निशां छोड़ गए

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  नमस्कार,जोहार, खम्मागन्नी सा🙏 आज मैं अपने ब्लॉग की रचना में जिक्र की हूं, की जानेवाले तो चले जाते हैं।किंतु अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाते हैं ।और दोस्तों की, रिश्तेदारों की, अपनों की, उनके राजदारों की भी उनसे कई सवाल होते हैं।कई अफशोस होते हैं ।जिसे मैं चित्रित करने का प्रयास की हूं।        "निशां छोड़ गए" तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए अपनी कहकहों में आंसुओं को पी गए थी इतनी ही चिंता तुम्हे अपनों की तो बीच मझधार में पतवार क्यों छोड़ गए। तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए कभी किसी से न की गीले-शिक़वे बस मुस्कराकर हर बात टाल दिए हम क्या जानते थे टालने के तो वो बहाने थे असल मे वो बात तुम दिल पे ले लिए। तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए अपनी जिंदादिली में व्याकुलता छुपा गए मासूम चेहरे के पीछे दर्द था कितना गहरा ये राज राजदारों से भी तुम छुपा गए। तुम जाकर भी अपनी निशां छोड़ गए आज समझ आयी तेरी बातों की गहराइयाँ जब तुम हँस कर कहते थे तो न समझा और तूने भी तो, मज़ाक था यार कह के हर बातों की गहराइयों को, टाला करते थे मज़ाक में कही बातें भी तुम सच कर गए। तुम...

क्या खूब कहा है-आँसुयों को जगह आंखों में भी नहीं मिलती

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आज के बदलते परिवेश में जो रिश्तों के मायने रह गए हैं।उन्हें मैं अपने शब्द तूलिका से ढालने के प्रयास की हूं।🙏 आशा करती हूं कि आपसभी को पसंद आएगी। "क्या खूब कहा है"  गुलजार साहब ने भी क्या खूब कहा है- "हंसते रहोगे तो दुनिया साथ है वरना आंसुओं को तो जगह आंखों में भी नहीं मिलती।" दीवाने सभी हैं सफ़लतायों के गर्दिशों के तो सिर्फ मज़ाक उड़ाया करते हैं साथी हैं सभी खुशियों के गमों को तो सिर्फ दोस्त बांटा करते हैं। पर सुना है आजकल दोस्ती के भी मायने बदल गए हैं बदलते दौर में पैमाने बदल गए हैं हितैषी कम,उसके वेश में दुश्मन ज्यादा हो गए हैं, भौतिकता के इस दौर में निश्छलता, निश्वार्थ भावना कहीं खो सी गयी है। आधुनिकता के इस चलन में दुनिया की संगत ही बदल गयी है दोस्ती, और रिश्तों मे भी अब मतलबपरस्ती का डेरा है। जिधर देखो उधर ही अराजकता का बोलबाला है, संबंध हुए तार-तार, पैसों की तराज़ू पे बिक रहा ईमान, स्वाभिमान। गुलज़ार साहब ने भी क्या खूब कहा है। "आँसुयों को जगह तो आंखों में भी नही मिलती।' श्रीमती मुक्ता सिंह रंका राज 25/6/2020 ...

जनाज़े पे अश्क के फूल चढ़ा देना

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आज मैं हर ओ शख्स के लिए ये नज़्म लिख रही हूं।जो अपनी असफलताओं से मायूस हो इस दुनिया को अलविदा कह जाते हैं।और ज़माने से अपनी ज़िन्दगी से बहुत कुछ पाना चाहते हैं।पर उन्हें ठोकरें मिलती हैं।तो जाते वक्त उनकी जो मनोदशा होती है, शिकायतें होती हैं।उसको वर्णन करने का छोटा सा प्रयास है मेरा।आशा करती हूं कि आप सभी को पसंद आएगी। और मेरी इस रचना में निराशा में जाते हुए भी एक आशा है,जो कि शीर्षक से ही पता चलता है।🙏 "जनाज़े पे अश्क के फूल चढ़ा देना' ये ज़िन्दगी आज तेरे कूचे से यूं रुसवा होकर चले हैं हम, कम से कम जनाजे पे दो अश्क तो बहा देना, और थोड़ा समय मिले मशरूफियत से, तो मेरी कब्र पे ,याद में मोहब्बत के दो फूल चढ़ा देना। बड़ी आशाओं से दामन थामा था मैंने कामयाबियों के, वक्त ने नज़ाकत क्या दिखाई सफलताओं ने भी मुंह मोड़ लिया जैसे, और ज़माने के तानों ने भी छेड़ दिया है अफ़साने रुसवाइयों के। सोचा था है बस कुछ दिनों का मेहमान तू मौसमों की तरह एक दिन वक्त के साथ निकल जायेगा तू, पर जमाने कि रुसवाइयों पे जैसे सवार बैठा था तू। लो आज तेरी ही विजय हो गई मैं तो हार गया, जंग लड़ते-लड़त...

ख्वाबों के घेरे में

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  नमस्कार,जोहार, खम्मागन्नी सा,अभिनंदन 🙏 आज मैं उन प्रेमियों के दिलों की भावनाओं को व्यक्त करने की एक छोटी सी कोशिश की हूं।जो कर्तव्य पथ पे अग्रसर होने के लिए न चाहते हुए भी चलते हैं।ऐसे में एक प्रेमिका के उलाहना भरे शब्दों को चित्रित करने का प्रयास की हूं।और मुझे आशा है कि आपलोगों को पसंद आएगी। *ख्वाबों के घेरे में* अधूरे मोहब्बत के ख्वाबों के घेरे में तुम मुझे छोड़ जाते हो, साथ मिलता है बमुश्क़िलों से, कर्तव्यों के पथों पे हाथ छोड़े जाते हो, फिर जल्दी मिलूंगा का दिलासा दिए आशाओं के घेरे में छोड़े जाते हो । पर अब जिम्मेवारियों का घेरों का दायरा होने लगा है बड़ा, मंजिलों के सफ़र में अब तन्हाइयां बनने लगी हैं हमसफ़र तेरे, और हमसफ़र के सफ़र में विरह का लगने लगा है मेला । इस मेले के भीड़-भाड़ में चारों ओर तन्हाइयों का कुछ यूं पहरा है, जिधर देखूं बस उधर मुस्कराता दिखता है तेरा ही चेहरा , उस चेहरे को छूने की कोशिश, तेरे दूर जाने की अनुभूति है । अनुभूतियों का तो क्या कहना है अब, बिन बुलाए सैलाब से उमड़ते हैं, और अपनी वेग में हमें भी, तेरी यादों के समंदर में डुबो जाते हैं, तेरी ...

मेरे पापा

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आज पापा जी आपकी बहुत याद आ रही है।आंखों से अश्रु की अविरल धारा रुकने से इनकार कर रही है।शायद उसे भी मेरे मनोभावों का पता है।तभी तो वह अडिग हो साथ दे रही है।आपका वो दुलार, प्यार और जादूगरी बहुत याद आ रही है।                   *मेरे पापा* क्यों छोड़ गए मुझे मझधार में इस मतलबी दुनिया के बीच अकेला आप तो जानते थे मैं घुट-घुट कर जिऊंगी आपके बिना, क्योंकि बिन नीव इमारतें गिर जाती हैं। न जाने कौन सा जादू जानते थे आप की बिन बोले जान जाते थे मेरी हर बात आप ही तो थे आदर्श मेरे बिन आदर्शों के क्या मूल्य है जीवन का। अजीब सी टेलीपैथी थी हमारी मैं याद करती और आप बिना संदेश आ जाते थे प्यार के दो मीठे बोल में अमृत घोल पिला जाते थे। फिर क्या हुआ ऐसा जो रूठ गए मुझसे बिन बोले, बिन पते के देश चले गए अब तो हर पता एक क्लिक पे खुल जाता है तो आप बिन पते के देश क्यों चले गए। अब कैसे बतायूँ हाल अपने दिल का अब तो टेलीपैथी भी काम नही करती अब कैसे बुलायूँ आपको कि एक बार फिर से आ जाइए पापा सीने से लगा मुझे, दुनिया से छुपा लीजिये सर पे, फिर से...