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वीर राजकुमारी चम्पा

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 वीर राजकुमारी चम्पा कहा जाता है कि हमारी भारत-भूमि के कण-कण में हैं बलिदानी।आज हम आप सभी को ऐसी ही देशप्रेम से ओत-प्रोत वीर बालिका से मिलवाने वाली हूं।जिसेके धमनियों में विरासत में वीर पिता महाराणा प्रताप से देशप्रेम,दयालुता और वीरता मिला था।वो थी हमारे महाराणा प्रताप की सुपुत्री " मासूम वीर राजकुमारी चम्पा"। वीर राजकुमारी चम्पा :  बताया जाता है कि जब महाराणा प्रताप मुगलों के समक्ष झुकने के बजाए जब वन-वन भटक रहे थे तो उनके साथ उनके बच्चों को भी भूखे-प्यासे दिन-रात पैदल चलना पड़ता था। 3-3, 4-4 दिन तक वो जंगली बेर व घास की रोटियां खाकर रहते थे।उस समय महाराणा की पुत्री चम्पा 11 वर्ष की और उनके पुत्र 4 वर्ष के थे।एकदिन राजकुमारी चम्पा अपने 4 वर्षीय भाई के साथ नदी किनारे खेल रही थी,तब राजकुमार को भूख लग गयी।और वह रोटी मांगते हुए रोने लगे।उस छोटे से सुकोमल राजकुमार को यह कहाँ ज्ञात की आज उनके माता-पिता के पास अपने युवराज के लिए रोटी का टुकड़ा भी नहीं है।ऐसे में राजकुमारी चम्पा ने अपने भाई को कहानी सुनाकर व फूलों की माला पहनाकर भूखा ही बहला कर सुला दिया। और जब राजकुमारी चम्पा अ...

🙏🏻लता दीदी,विनम्र श्रद्धांजलि🙏🏻

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 🙏🏻लता दीदी,विनम्र श्रद्धांजलि🙏🏻 सुर सम्राज्ञी, सरस्वती स्वरूपा,भारत कोकिला हमारी प्यारी लता दीदी,कहाँ चली गयी बसंत पंचमी के उत्सव में खोए थे सभी आपने भी चुना दिन वही मां सरस्वती विसर्जन का वो तो अगले साल फिर आएंगी,आशीर्वाद देने पर आप निकल पड़ीं अनन्त सफ़र पे जहां से नही लौटा है कोई जाकर सुरों की मल्लिका,अब क्या खूब गया था आपने "नाम गुम जाएगा,चेहरा बदल जाएगा,  पर मेरी आवाज़ ही मेरी पहचान है" आपसे पहले ना कोई आया था ना सदियों तक कोई आपसा आएगा। इतनी सी ही विनती है हमारी- ये जानेवाले हो सके तो फिर लौट कर आना तेरी आवाज़ के बिना मुश्किल है अब जीना हमारे देश की पहचान थीं आप संगीत की मान थीं आप जैसे सुरों को धड़कना सिखायथा आपने हर सुर की माप थी आपकी आवाज़ जरा आंख में भरलो पानी’, ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’, ‘अजीब दास्तान है ये’, ‘प्यार किया तो डरना क्या’, ‘नीला आसमां सो गया’ और ‘तेरे लिए’ जैसेआ जा रे परदेसी, मैं तो कब से खड़ी इस पार, इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रख के, बाहों में चले आओ.. हमसे सनम क्या पर्दा, शीशा हो या दिल हो टूट जाता है, तू जहां-जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा, लगा...

सब याद आती है बेइन्तहां

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 सब याद आती है बेइन्तहां तेरे बचपन की वो अठखेलियाँ,शरारतें  सब याद आती हैं बेइन्तहां आत्मविश्वास से लबरेज़ तेरा चेहरा बचपन मे भी रहता था चमकता और सबसे अलग थी तेरी मासूमियत गलती कर कोने में छुप धीमे से मुस्काना भगवान पे चढ़ी आशीर्वाद रूपी माला को  अपने सर पे ताज सा सजा खिलखिलाना सब याद आती है बेइन्तहां छोटे भाई को चुपके से शरारत सीखा मासूमियत ओढ़े अनजान बन जाना सुंदर इतनी थी मेरी गुड़िया,ठहर जाती थी लोगों की निगाहें खुद-ब-खुद तुझपे नाज़ुक थी इतनी,कि तारीफों की बारिश से भीगते ही, नज़र लग जाती थी तुझे सब याद आती है बेइन्तहा बचपन से ही अपनो से मिलती थी तुम रिश्तों की खिलखिलाहट में लपेटे वो तेरा प्यार भरा स्पर्श सबसे था अलग वो अहसास अब काश मे लिपट गया आज भी गले लग लिपट कर गोद में छुप जाती थी छोटी बच्ची सी सब याद आती है बेइन्तहां तेरे नींद से जगते ही गुलज़ार  हो जाती थी मेरी छोटी सी दुनिया,अब  सन्नाटा रहता है यहां हरवक्त कब्ज़ा जमाये सुबह-सुबह वो तेरा कम्बल से थोड़ा सा  मुस्कराता चेहरा निकाल मनुहार करना  बस पांच मिनट और मम्मी और  मासूमियत ओढ़े मुस्कराते हुए सो जा...

तेरा अहसास

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 #तेरा अहसास# आज सुबह से ही फ़िज़ायों में तेरी  मौजूदगी का अहसास जाना-पहचान सा है स्मृति पटल के आईने में चलचित्र सा  तेरी यादों के जखीरे का रत्न फैला है बंद पलकों में तुम यूँ मुस्कराती हो लगता है ये कोई ख्वाब या तू ही है आंखे खोलते ही यथार्थ की पथरीली धरातल चिढ़ाती सी आंखे तरेरती है मेरी परी,तुम्हे तो मै प्यार से परी बुलाती थी पर मै क्या जानती थी तुम सच में एक परी हो जो सुनहरे ख़्वाबों के झूले में आई थी  मुझे झुलाने,और जब मंजिलें दिखने लगी तो कालरूपी राक्षस की लग गयी नज़र तुझे काल तूने डस लिया मेरी खुशियां सारी पर मां की हाय एकदिन लगेगी तुझे भी अब तो तेरे अहसासों के खुशबुयों से जीना है  ऑंसूयों के समंदर में खुद को डुबो के  काश कोई ये कह दे,ये एक बुरा ख्वाब था तू फिर से खिलखिलाती-इठलाती थोड़ा मनुहार जताती आ जाये कहीं से मैं गोद में छुपा लुंगी तुझे,दुनिया की नज़रों से ममता के सागर से सराबोर कर निहारूँगी तुझे श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 22/11/21

कैसे जियूँ तेरे बिन

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 *कैसे जियूँ तेरे बिन* सब्र ही नही होता अब,लाख समझाऊं दुनियादारी चूक ही नही मिलती,लाख ढूंढता दिल बारीकी से सपने सज़ा रही थी तेरी शहनाइयों की गीतों के बोल संभाल रही थी चुपके से डोली-काहार और न जाने कितने ख़्वाब खुली आँखों से देख रही थी रोज नए कपड़े-गहने सभी संभाल रही थी तुझे सपनों में सजा-सजा कर रिश्तेदारों की लिस्ट भी बना रखी थी भूले-बिसरे रिश्तों को भी संभाल रही थी हर रश्मों को नए अंदाज़ में निभाने को चुन रही थी एक्सपर्टों की टोली ताकि कमी ना रहे मेरी लाडो के शादी में उंगली ना कोई उठाये कभी रिवाज़ों को लेकर बस इंतज़ार था तेरे सपनों की उड़ान भरने को फिर हर ख्वाब रखती तेरे कदमों में नियति भी दूर खड़ा बन रहा था जाल मैं अनजान सो रही थी ख़्वाबों की ठंढी छांव में जाने कहाँ से एकपल को आया क्रूर काल ले गया मेरी धड़कन को बवंडर में छुपा कर अब कैसे जियूँ तेरे बिन मेरी लाडली कोशिशों की पहाड़ चढ़ती हूं हरपल जिम्मेवारियों की बन्धन में खुद को कैद कर तभी तेरी यादों का झोंका आता है और उमड़ पड़ते हैं दर्द के सागर  नयनों से हर बन्धन को तोड़ कर श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 19/11/21

तस्वीरें देख अहसासों को जीना है

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 #तस्वीरें देख अहसासों को जीना है# तेरी तस्वीर जब भी देखती हूँ अहसासों की लहरें बेताब हो उठती हैं प्रयासों की पतवार थामे आगे बढ़ती हूं तब ही यादों का तूफान आ घेर लेता है कभी डैडी,कभी मम्मी को आलिंगन कर बांध रही थी तुम सुनहरे ख़्वाबों के आसमां में अनजाने में सज़ा रही थी बड़े प्यार से यादों के घरौंदों को,बीते लम्हों के ख़ज़ाने से वक़्त की लगी ऐसी नज़र,फ़ना हो गयी खुशियां पल में,धीमी हो गयी हमारी नब्ज़  हमारी खुशियों की मंज़िल थी तुम हमारा स्वाभिमान,गर्व थी तुम मेरी लाडली बहुमूल्य अनोखे बंधनों की गवाह  तेरी तस्वीरे गुजरे लम्हों की इबादत हैं जहाँ हो खुश रहो,शायद ईश्वर को  मुझसे ज्यादा जरूरत थी तुम्हारी अब तेरी यादों से ही लाड लड़ाएंगे तुम भले ही चली गयी मुझे छोड़कर पर मेरी धड़कनों से कैसे जा पाओगी तेरे बिना जीती हूं,कर्तव्यों को निभाने को अब तस्वीरे देख,अहसासों को जीना है शिकायतों का पुलिंदा है,इंतज़ार का अंधेरा है दिल में दर्द, होठों पे मुस्कराहट का पहरा है आसरे की देहरी पे,तेरी आहटों की उम्मीद है श्रीमती मुक्ता सिंह रंकाराज 9/11/21